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देश की बात

VISION NOTE

देश की बात फाउनडेशन द्वारा आयोजित

भारतीय युवा संवाद-2

(26 जनवरी से 31 जनवरी 2021 तक)

सकारात्मक राष्ट्रवाद द्वारा
सामाजिक व राजनीतिक न्याय
तथा राष्ट्रीय एकता को सुनिश्चित करके
देश को शक्तिशाली बनाने के लिए

दोस्तों, हम एक ऐसे वक्त से गुजर रहे हैं, जहाँ एक तरफ कोरोना जैसी वैश्विक महामारी मौत का साया बनकर हमारे ऊपर मंडरा रही है वही दूसरी तरफ हमारी अर्थव्यवस्था बुरी तरह टूटती जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत तो पहले से ही खराब चल रही थी, रही सही कसर कोरोना के इस संकट ने पूरी कर दी। जिसका असर दिहाड़ी मजदूरों से लेकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रहे युवाओं पर भी पड़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान महामारी की वजह से भारत की बेरोजगारी दर 23 फीसदी से बढ़कर 45 फीसदी तक हो सकती है। कोरोना की इस महामारी ने अर्थव्यवस्था को इस कदर लचर बना दिया है जिससे भारी संख्या में युवाओं के रोजगार छीने जा रहे हैं। यह देश पहले से ही बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा था, कोरोना से उपजे संकट और सरकार की उदासीनता ने इस समस्या को और भी विकराल बना दिया है। भारत दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र है क्योंकि यहाँ की 65 फीसदी से ज़्यादा की आबादी युवाओं की है। लेकिन इन युवाओं की हालत बेहद सोचनीय है। रोजगार का संकट इनके भविष्य पर एक ऐसा सवालिया निशान है जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता। मौजूदा सरकार युवाओं के रोजगार के सवाल पर पूरी तरह से असंवेदनशील है। भारत के आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह ग़ैरबराबरी है। आज़ादी के बाद भूमि सुधार (Land reform) जैसे कानूनों के ज़रिये संपत्ति के विकेंद्रीकरण की कोशिश की गई लेकिन कुछ राज्यों को छोड़कर इसे कहीं भी ईमानदारी से लागू नहीं किया गया। दूसरी तरफ देश में लागू की गई मिश्रित अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे न सिर्फ पूंजीवादी व्यवस्था में बदल गई बल्कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शक्तियों के सामने समर्पण भी कर दिया। इतना ही नहीं भारत की परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक के विकास की जगह हमारी सरकारें दूसरे देशों की पिछलग्गू बन कर रह गई जिसने हमारे देश की सकारात्मक विकास की गति को बाधित किया। नतीज़ा यह निकला कि जो अमीर था वो और अमीर हो गया और जो गरीब था वो और भी गरीब हो गया। ऑक्सफ़ैम (OXFAM) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 1 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के पास निचले तबके के 70 प्रतिशत (95 करोड़ से अधिक) लोगों की कुल संपत्ति के 4 गुना से भी ज्यादा संपत्ति है। सरकार द्वारा रोजगार और आर्थिक गैरबराबरी जैसे असल मसलों को सुलझाने के बजाय देश के सामाजिक तानेबाने को बिगाड़ कर लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। मीडिया, सोशल मीडिया और सत्ताधारी पार्टी के बड़बोले नेताओं के बयानों ने सामाजिक एकता के तार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। स्थिति यह है कि आज हमारी अर्थव्यवस्था ही कमजोर नहीं हुई है बल्कि हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एकता भी कमजोर हुई है। आज पूरा भारत एक नकारात्मक सोच की वजह से मानसिक विभाजन के कगार पर खड़ा है। हम सभी जानते हैं कि देश को मजबूत करने के लिए समस्त देशवासियों की सामाजिक एकता अनिवार्य शर्त है। भारत की सामाजिक एकता तब तक सुनिश्चित नहीं की जा सकती जब तक कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित न हो। सामाजिक न्याय का संबंध अक्सर सिर्फ जाति और आरक्षण से जोड़ा जाता है लेकिन असल में सामाजिक न्याय का मतलब है - समाज में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए न्याय की गारंटी। जिसकी ज़द में जाति के अलावा धर्म, संप्रदाय, वर्ग, लिंग, क्षेत्र और भाषा जैसे वे सभी घटक आते हैं जो सामाजिक विभेद के आधार रहे हैं। सामाजिक न्याय के साथ एकता की अवधारणा इस विभेद को खत्म कर बराबरी और भाईचारे के समाज को बनाने की दिशा में एक ज़रूरी पहल साबित होगी। इसके लिए ख़ास तौर पर आज के युवाओं को खुले दिमाग से इस दिशा में कदम बढ़ाना होगा। आज़ादी की लड़ाई के दौरान ही यह तय हो गया था कि आज़ाद हिन्दुस्तान में सबके लिए राजनीतिक न्याय सुनिश्चित होगा। हमारा संविधान इस बात की गारंटी भी देता है लेकिन आज हम जिस हिन्दुस्तान में रह रहे हैं उसमें दिन-प्रतिदिन लोगों के राजनीतिक अधिकार सिकुड़ते जा रहे हैं। आज मसला चाहे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हो, प्रोटेस्ट करने के हक़ का हो या फिर सरकार की जनता विरोधी नीतियों की आलोचना का, हर तरफ से प्रतिरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश चल रही है। आज एक व्यक्ति, एक पार्टी के खिलाफ बोलने का मतलब है आप देश के खिलाफ बोल रहे हैं। इस एक गुनाह के लिए आप पर सेडिशन का चार्ज लगाया जा सकता है आप को राष्ट्रद्रोही साबित किया जा सकता है, सरे-राह आपकी लिंचिंग भी की जा सकती है। और ये सब होता है उनकी तथाकथित देशभक्ति के नाम पर। क्योंकि उनकी देशभक्ति एक व्यक्ति, एक पार्टी, एक विचार और एक परचम से बनती है उसमें भारत के संविधान के उन मूल्यों की कोई जगह नहीं है जो सबके विचारों और अधिकारों की रक्षा को सुनिश्चित करता है। आज के ये संकट चाहे वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गैरबराबरी हो, समाज में व्याप्त द्वेष हो या फिर राष्ट्रीय एकता को तोड़ने की कोशिश – इन सारी समस्याओं की जड़ उस सोच में निहित है जो नकारात्मक राष्ट्रवाद से संचालित हो रही है। नकारात्मक राष्ट्रवाद आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक बराबरी, राजनीतिक अधिकारों और राष्ट्रीय एकता को सुनिश्चित करने के बजाय बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुँचाने, सामाजिक विषमता को और गहरा करने, उसके ताने-बाने को बिगाड़ने तथा राष्ट्रीय एकता को तोड़ने का काम कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नकारात्मक राष्ट्रवाद का आधार ही नफरत है जो असल मसलों को हल करने के बजाय इंसान को इंसान के खिलाफ खड़ा करके अपनी सत्ता को बरक़रार रखना चाहता है। वो अपने सत्ता के स्वार्थ को पूरा करने के लिए धर्म, संस्कृति व देश का राग इतने जोर-जोर से अलापते हैं जिससे पढ़े-लिखे लोग भी भ्रम का शिकार हो जाते हैं और इसे ही आखिरी सच मान लेते हैं। नकारात्मक राष्ट्रवाद और उससे उपजे तमाम चुनौतियों का माकूल जवाब सकारात्मक राष्ट्रवाद के पास है जिसकी बुनियाद मोहब्बत है और जिसका लक्ष्य भारत में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता को सुनिश्चित कर भारत को एक मज़बूत राष्ट्र बनाना है। सकारात्मक राष्ट्रवाद के अनुसार देशभक्ति किसी दल या किसी नेता की अंधभक्ति में नहीं बल्कि भारत के सभी लोगों तक रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाने के लिए कोशिश करने का नाम है। जिससे सभी लोगों में सकारात्मक राष्ट्रवादी भावना पैदा हो सके। ‘देश की बात’ द्वारा आयोजित ‘भारतीय युवा संवाद’ देश को आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता के सवाल पर जागरूक करने की एक ऐसी पहल है जिससे भारत को उस मुकम्मल अंजाम तक पहुँचाया जा सकता है, जो हमारे आज़ादी के शहीदों के सपनों का भारत होगा, जो हर भारतीय के सपनों का शक्तिशाली भारत होगा। आइये इस देश से मोहब्बत करने वाले हम सभी भारतीय युवा मिलकर नई सोच पैदा करने के लिए आपस में संवाद करें, आपस में एकजुट हो। आइये भारतीय युवा संवाद से जुड़े।

Desh ki Baat Foundation Presents

Indian Youth Dialogue-2

(26 January to 31 January 2021)

Making country strong through integration of economic, social and political justice along with national unity through Positive Nationalism

Friends, we are passing through a very challenging phase, where the shadow of death caused by the pandemic triggered by COVID19 looms large over us, whilst our economy too is disintegrating at a rapid pace. The country’s economy was already in shambles and whatever was still standing has been further wrecked by the spread of the coronavirus. The situation has adversely affected everyone from casual labourers to employees of big multinational companies. According to estimations, due to the pandemic, unemployment in India will increase from 23 per cent to 45 per cent. COVID19 has impacted economy to the extent that major section of youth is facing unemployment. There already existed an employment crisis in the country, which has been further compounded by the virus attack and the central government’s total incompetence in dealing with it. India has one of the largest youth population which is more than 65 per cent of its population. But the condition of youth in our country is worrisome. The problem of rising unemployment is a question which no one wishes to address. Current government is oblivious to the question of employment. Rising inequality is one of the main reasons for the economic condition of our country. India went through land reforms after independence. The reform attempted to wealth redistribution but couldn’t succeed as except a few states, the same was not strictly imposed in whole country. One the other hand, India which started out as mixed economy soon transformed into a capitalist economy which led to its complete surrender to international economic organisations. Rather than developing technology in accordance with India’s condition, our governments chose to stay behind other countries. This acted as hindrance in the pace of positive development. This led to polarisation of wealth with rich becoming richer and poor becoming poorer. According to OXFAM's report, India's richest 1 per cent hold more than four-times the wealth held by 953 million people who make up for the bottom 70 percent of the country's population. Instead of finding solutions to the increasing unemployment and economic disparity in the country, current government regime is instead trying to divert the attention of the people by sabotaging the social fabric of the country. The statements in media, social media and by political party's spokespersons constantly attack social unity of our country. Today along with our economic condition, our social and national unity has lost its power. The prevailing negative sentiments in the country, is on the verge of causing a psychological disruption in the country. We all know that social unity of all the residents of the country are essential condition for strengthening the country. India's social unity cannot be guaranteed till the time social justice is not properly constituted. Social justice is not limited to caste system and reservations, social justice in reality means guaranteed justice for every member of the society. This includes justice towards other components of society such as religion, sect, class, language, gender, region and language which have been the basis of social discrimination. Social justice along with social unity is an important step towards eradication of this discrimination and for providing the society of equality and brotherhood. For this, Indian youth will have to move towards this direction with an open mind. During independence struggle it was envisioned that there would be political justice of everyone in independent India. Our constitution guarantees the same. India, these days, is experiencing shrinking political rights of its citizens. There is constant attempt to suppress dissent which can be seen in context of issues like freedom of expression, right to protest or the right of criticising anti-citizen policies. Presently, speaking against the ruling party or its leaders, is equated to speaking against the country. Such an outrage can either lead to the charge of sedition charged against you, to being labelled as an anti-national or worse, you may be lynched on the streets. All this is done in the name of ‘patriotism’. This shows that how patriotism is toward one person, one party, one idea and one glory. In this patriotism, there is no place for those constitutional values which talk about defence of ideas and rights of all. Present problems, whether it is economic and social equality, widespread hatred or attempt to break national unity, have their roots in ideology of Negative Nationalism. Negative nationalism, instead of ensuring economic security, social equality, political rights and national unity, is working to benefit the big capitalists, deepen social inequality, spoil its fabric and break national unity. This is because the basis of negative nationalism is hatred, which rather than helping in solving real social issues works towards putting people against each other. This helps them maintain their political position. They, in order to maintain their political interest, chant raga of religion, culture and nation so noisily that even educated population falls prey to the illusion and accept the same as the ultimate truth. We clearly believe that with the help of technology, such industries and factories can be developed in accordance with India's natural resources, human intelligence and manpower so that everyone can gain employment. When we are saying technology, it has to be kept in mind that today we need to develop technology to suit India's ecology instead of blindly imitating the prevailing technology of the world. We do not want technology that is harmful to our nature, nor do we want technology that takes away our people's employment. We need labour intensive technology that complement the needs of our nation. India is a labour-intensive country, in such a situation, we have to move towards technology that is complementary to the labour force of our country, gives them employment and ensures their participation in nation building. All issues stemming out of negative nationalism and the resultant hurdles can be addressed through the idea of positive nationalism. The central emotion around which positive nationalism revolves is love and its aim is to ensure that India provides for economic, social and political justice along with national unity that leads to strengthening the country inside out. According to positive nationalism, patriotism is not limited to blindly following a party or its leader, but is all about focussing on providing basic needs like food, cloth, house, education, health and employment to every citizen, this would help plant sentiments of positive nationalism amongst the people. The 'Indian Youth Dialogue' is being organized by 'Desh ki Baat' as an initiative to make country aware of the questions of economic, social and political justice along with national unity. Leading our country towards India of the dreams of freedom fighters. This would be a strong country of every Indian’s dream. Let us then all unite, especially the Indian youth, who love this country, forge new thinking, learn to dialogue with each other and unite.

Come and be part of Indian Youth Dialogue.
Proposed sessions for Indian Youth Dialogue

PROGRAM SCHEDULE

MISSION DESH KI BAAT

आज हम सब लोगों को उन तमाम सवालों के बारे में सोचने की ज़रूरत है जो आज़ादी के इतने सालों बाद भी अनुत्तरित पड़े हैं, जिसके जवाब के लिए हमारे पुरखों ने अपनी कुर्बानी दी । रोटी तो हम तब भी खा लेते थे, जब हम गुलाम थे । नींद हमें तब भी आ जाती थी, जब हम गुलाम थे । शादी-ब्याह-रिश्तेदारी तब भी हो जाती थी, जब हम गुलाम थे । लेकिन हमारे पुरखों को यह ग़ुलामी मंजूर नहीं थी । हमारे देश की आज़ादी के लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी । अपना सर्वस्व न्यौछावर किया । लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी, अपना सब कुछ त्याग कर दिया । इस देश को आज़ादी इसी त्याग, तपस्या और बलिदान के दम पर मिली है । लेकिन आज़ादी के इतने सालों बाद आज भी मजदूरों की ज़िंदगी जानवरों से बदतर हो गई है, किसान का हाल और भी बेहाल हो गया है, छात्रों को अपनी डिग्रियां लेकर भटकना पड़ रहा है तो हमारे मन में प्रश्न पैदा होता है कि आखिर हमने आज़ादी के इतने सालों में क्या किया है ? आज़ादी के इतने सालों बाद भी आज अगर महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की बनी हुई है तो उससे मुक्ति का रास्ता क्या हो सकता है ? समाज के उन तमाम तबके जिनके श्रम से, जिनकी मेहनत से इस देश का निर्माण होता है, उनके हालात इतने ख़राब क्यों हैं ? खेत में अगर मज़दूर -किसान काम ना करें तो अन्न पैदा नहीं हो सकता । देश की फैक्ट्रियों में अगर मज़दूर अपना खून-पसीना ना बहायें तो आज विकास की जो चकाचौंध दुनिया है, वह अपने दम पर संसाधन पैदा नहीं कर सकती ।